Sunday, March 17, 2013

સિપાહીની માનું ગીત



રણઘેલુડો થા'મા ડીચરા, રણઘેલુડો થા'મા. 

જુધ્ધ નઈ આ ખળાના ભાગનું, ખમ્મા !
જુધ્ધ નઈ આ ધણની હાકનું, ખમ્મા !
જુધ્ધ નઈ આ કુંવાસીની લાજનું, ખમ્મા !
જુધ્ધ નઈ આ વડવાની શાખનું, ખમ્મા !

આ તો રાજનો રમતો ઘોડલો, રાશ્ય એની ઝાલવા જા'મા.
રણઘેલુડો થા'મા ડીચરા, રણઘેલુડો થા'મા.

પોર'દી તારા ઘાવ ભર્યાનું કળ હજીયે મારી આંગળીએ, 
દીકરી તારી ભઈ હજુ તો માંડ ચાલતા શીખી ભાખડીયે.
સરહદયું તો કાલ ભુંહાઈ જાશે કર ઝાઝી ચીન્ત્યા'મા.
રણઘેલુડો થા'મા ડીચરા, રણઘેલુડો થા'મા.

આ ખડગ મેલી હળ હાંકેશ તોય તું મારો વીર રેવાનો,
મોભારે ચડ્યું દેવું વીરા વાણિયો હવે નઈ ધીરવાનો,
આ એકની હાટુ રાંક રેયતનું લોહી ખેડવા જા'મા.
રણઘેલુડો થા'મા ડીચરા, રણઘેલુડો થા'મા.

જુધ્ધમાં જેનું માથું વાઢીશ એ ય કોકનો વીર હશે ભઈ,
એની માવડીના યે મારી જેમ ફાટેલા ચીર હશે ભઈ,
તું આવે જીતી જુધ્ધ તોયે થાશે હરખ નઈ પોંખવા'મા.

રણઘેલુડો થા'મા ડીચરા, રણઘેલુડો થા'મા.
 

- મેહુલ મકવાણા, 25 ફેબ્રુઆરી, 2013 

Thursday, March 7, 2013

જીવન વટાવ્યે રાખે


જીવે છે બે ચાર, બાકીના ફરજ નિભાવ્યે રાખે,
ગણી ટાણા સુખ દુખને, દિવસ ટૂંકાવ્યે રાખે.

એવા તે શા પાપ તારા કે કદી ન આવે સામે ?
મંદિર, મસ્જીદ દેવળમાં તું શું સંતાયે રાખે ?

હોય જાણ મોડો આવીશ ને જમીશ તો નઈ જ,
મા છે એ માને નહિ થાળી ઢાંકેલી છતાંયે રાખે.

એક હું છું કે યાદ રાખું ન એકેય ગુનાહ એના, 
એ પણ મારી જાણ બહાર ખુદ પસ્તાયે રાખે.

બેન્કિંગ સેક્ટરની તેજી સવારે છાપું બોલે ને, 
બે રૂપરડીમાં લોકો અહી જીવન વટાવ્યે રાખે.
- મેહુલ મકવાણા, ૧૨ / ૧૨ / ૨૦૧૧ , અમદાવાદ 

Saturday, March 2, 2013

२८ फरवरी २० १ ३


सच कहु तो में कुछ नहीं चाहता हु 
न वो उजड़ी दुकाँ सुधारना चाहता हु 
न ही जख्मो पर कोई पट्टी लगाना चाहता हु !
जल गए घरो के मलबो से अब तो धुंवा भी निकलना बंद हो चूका  
अब कब तक राख कुरेदू मै ?
कल जो फूट पड़ा था झरना रक्त का 
अब वो सेकड़ो झरनों से मिलता बन चूका है दरिया 
अब इतनी सहज है उसकी धार 
की मै कैसे बोलू इसीमे डूबी थी मेरी नाव !
गुजर चुके लोगो की तस्वीरों पर 
वक्त जमा रहा है बालू 
उसी नदी के किनारे से खिंची हुई !
चोराहे के टावर पे घडी वही है रुकी हुई !
अब न मै लड़ना चाहता हु 
न में न्याय पाना चाहता हु !
न कोई मुआबजा चाहता हु रक्तचाप का !
में कुछ नहीं चाहता हु,  
उस घडी को वापिस घुमाने के अलावा !
कोई आज समय को घुमा दे वापिस उस लम्हे तक 
जहाँ से बात शुरू हुई थी !
वो गाड़ी वक्त से निकले, 
वक्त पर स्टेशन आए,
हँसते-खेलते लोग 
उतर जाए -चढ़ जाए !
हरी झंडी दीखते ही आगे चलती बने गाड़ी !
वो गाड़ी, जो स्टेशन को लांधकर 
लावा बन कर फ़ैल गई थी चारो दिशा में 
मै अब बस उस गाड़ी को सही सलामत 
उसके घर तक छोड़ना चाहता हु !
मै अब और कुछ नहीं चाहता हु !

मेहुल मकवाना, १ मार्च २० १ ३ , अहमदाबाद 

Saturday, February 23, 2013

वक्त


उनकी घडी जूठी है, 
शमशेर की नोक जेसे उसके काँटे वकत दिखाते नहीं, सिर्फ घुमाते है !
उनकी कलाई पे बंधी घडीने कैद कर रखा है चौराहे का पूरा टावर,
मेरा बिस्तर, एक फटी रजाई, बेरंग दीखते चप्पल,
रोजगार की कतार, हाथ की लकीरे, पेरो की ताकत,
जंगल के पेड़, समंदर की लहरे, 
न जाने क्या क्या कैद रखा है कमबख्त घडीने !
वो मोड़ सकते है घडी के नुकीले काँटे किसी भी ओर,  
अपने पालतू वक्त को जब चाहे तब छोड़ सकते है खुला हर दिशा में !
फिर वक्त वक्त न रह कर बन जाता है बहूरुपिया !
बहूरुपिया वक्त घुल जाता है बस्ती में,
बस जाता है खून मै !

आती-जाती औरतो को छेड़ता हुआ,
जवान लोंडो की कमर तोड़ता हुआ,
हवा का भेष लेकर मिल जाता है साँस में !
सब को अलग अलग रूप दिखाता है वक्त !
दूर दूर तक सच का नामोनिशान न हो फिर भी 
उनकी घडी में वक्त सतयुग है !
सच की शिनाख्त होते ही वो कह देते है यह कलयुग है !

जैसे कोई ग्वाला लठ से भेड़ बकरिया चराता है 
ठीक वेसे घडी के काँटों से वो हांकते रहते है हमें !
सर झुका के हम सोचते रहते है की कभी हमारा वक्त भी आएगा ....
जबकि हमारा वक्त तो पहले से ही कैद है उनकी घडी में !
हम नामुराद, नाअकल, बेवकूफ की तरह तकते रहते घडी को !
हम भूल चुके है वक्त की पहचान,
हम, जो कभी वक्त को तारो के आने-जाने से जान जाते थे,
हवा की लहरों से भी पहचान जाते थे वक्त,
जंगल में पेड़ के पत्तो से सूंघ लेते थे वक्त,
समन्दर के पानी से समझ जाते थे वक्त,
वक्त का वो रंग रूप हम भूल चुके है 
और फंस चुके है उनके बहुरूपिए वक्त की मायाजाल में ! 
यह जानते हुए, की सही वक्त देखना इतना मुश्किल भी नहीं !

सही वक्त आज भी दिख सकता है फुटपाथो पे,
सहमी सी लगती किसी भी लड़की की आँख में,
दिन दोगुने रात चोगुने दुबले हो रहे बच्चो की हड्डियो में,
बम के धमाको की गंध में,
किसी वेश्या की झुर्रियो में,
अस्पतालों में, दुकानों में
हर चीज की कतारों में, 
कभी बन न पाते मकानों में, 
खून से झगमगाती खानों में,
डर से सूखते जा रहे जंगलो में
दिख सकता है वक्त का सही रूप, वक्त के सही माने !

उनकी घडी जूठी है यारो, 
उसके झांसे में न आना, 
आते जाते रस्ते में कोई अगर पूछे वक्त ...
तो कह देना 
अब वक्त हुआ है लड़ने का !

मेहुल मकवाना, २२ फरवरी २ ० १ ३, अहमदाबाद  

Thursday, February 7, 2013

कलम की आग


कलम की आग भी कोई आग है ?
मौसम बदलते ही बर्फ बन जाती है कमीनी !
न घर का चूल्हा जला पाती है 
न चोराहे पर अलाव लगा पाती है !
कलम की आग भी कोई आग है ?

भेसे के आगे बजती बिन की तरह, 
कलम एक राग बनके रह जाती है, 
खुद ही आलापे - खुद ही सुने ! 
सर पर जब बन्दुक तनी हो लब्झ काम नहीं आते,
सारे अक्षर - सार ग्यान हो जाता है बेकार !
लिखते लिखते दांतों में कलम चबाने का शौक भी हवा हो जाता है 

चाहे लाख कविताए लिख दे पिछडो की प्यास पर,
कलम कतई नहीं बन सकती साफ़ पानी का वो गिलास जो उसकी जरुरत है !
कलम से बेशक बन सकता है नरम रोटी का चित्र
पर कलम खा नहीं सकता कोई !
पेट नहीं भरता कलम से !

भर दे पूरी लायब्रेर्री किताबो से,
चाहे कविताओ की लाइन लगा दे,
नए नाटक-कहानिओ का डाल दे डेरा,
क्या हम रोक पायेंगे उस बुलडोज़र को
जो निकला है पूरी बस्ती कुचलने !
कलम बस्ती की तरह होती है !
और बस्ती में बड़ी मुश्किल से जलते है चूल्हे !
जैसे बस्ती का होना कोई मायने नहीं रखता
कलम की आग भी कोई मायने नहीं रखती !
क्यूंकि जब सर पर बदूक तनती है,
जब लाठिया बरसती है,
जब अदालतों से, कचहरियो से आते है उलटेसीधे पैगाम,
कविताए सुन्न हो जाती है,
सारा ग्यान दर्शन रह जाता है धरा, 
और आखिर खून फ़ैलता जाता है कागज पर ! 

- मेहुल मकवाना, 7 फरवरी, अहमदाबाद 

Monday, February 4, 2013

कोमल ग़ज़ल



वो इस तरह फूलो में बहार ढूंढते है, 
मानो अखबार में खास इश्तिहार ढूंढते है !

जिस पर तुम्हारे ख्याल का साया न हो, 
इस जिन्दगी में हम ऐसा करार ढूंढते है !

न ग़ज़ल के हो मोहताज, न मय के साथी,
हम अपने आप में वो खुमार ढूंढते है !

सारा शहर सन्नाटे से भरा पड़ा है यहाँ ,
और एक हम है की पुकार ढूंढते है !

हर एक चीज मिल जाती है दुकानों में,
सिवा एक जिसे हम बेसुमार ढूंढते है ! 

पलक झपकने जितना भी शक हो न कभी,
हम तेरी आँखों में वो इख्तियार ढूंढते है !

हर हाथ मे पत्थर हेरानी की बात नहीं,
लोग यहाँ पत्थरो मे परवरदिगार ढूंढते है !

- मेहुल मकवाना,  22 जनवरी 2013, वेजलपुर 

Thursday, January 24, 2013

लाशें



सुरंगे खुद चुकी है !
गाँव से गाँव के बिच,  
शहर से शहर के बिच,  
उडल दी है हवाओ ने सारी मिटटी !
हो चुकी है सबकी सिनख्त !
हर एक कब्र अब कब्र से जुड़ चुकी है,  
हर गाँव से हर शहर तक, 
हर शहर से हर मुल्क तक, 
हर मुल्क से हर जहाँ तक ! 

अब लाशें कब्र से बाहर आने को तैयार है 
अब लाशे सबकुछ फूंकने को बेताब है 
मशीनों से काटे दिए गए मजदूरों की लाशे,
फालतू जंग में शहीद हुए सिपहिओ की लाशें,
दिन दहाड़े जलाए गए 
और एक पर एक दफनाये गए दलितों की लाशें, 
बन के पत्तो की तरह झड चुके आदिवासिओ की लाशे ! 
जानी पहचानी और अनजानी भी, 
सब लाशे बाहर आने को तैयार है !

लाशें मिल चुकी है एकदूजे से, 
लाशें आ गई है नतीजे पे, 
अब धरती चीरकर लाशें फूटेगी 
फुट पड़ेगी बम बनकर लाशे नेताओ पर,
फुट पड़ेगी खू के हर विक्रेताओ पर, 
जिस की नीव में होगा लहू का दाग 
जिसकी भी बुनियाद होगा मुफ्त पसीना 
ऐसे हर शख्स पर, हर मकाँ पर टूट पड़ेगी लाशें !

लाशें अब बारूद बनकर बरसेगी, 
लाशें अब हिसाब को गर्जेगी, 
लाशें मागेगी अपने हिस्से की जमीं 
लाशें मागेगी आसमान अपने हिस्से का !
आखरी वक़त मुह में रखे गए पुराने सिक्के का मोल भी लाशें मागेगी !

लाशो से कोई बच न पायेगा, 
लाशो से कोई छिप न पायेगा, 
सुरंगे खुद चुकी है चारो तरफ से,   
बिना कोई वारंट, बिना कोई पर्ची 
लाशें अब कहीं से भी फुट पड़ेगी !

लाशे निकल चुकी है हर कब्रिस्ता से 
हर एक मुर्दाघर से चल पड़ी है लाशें,

हर आँगन पर गुहार लगाएगी,
हर दरवाजा खटखटाएगी,
राजमहल को आग लगाएगी,
सारे सेठो के सिर मुंडवाएगी 
कदम कदम आगे बढ़ रही लाशें अब वापिस कब्र में नहीं जायेगी, 
गर जायेगी तो न जाने कितनो की लाशें लेकर जायेगी !

- मेहुल मकवाना, 22 जनवरी 2013, वेजलपुर