Thursday, January 24, 2013

लाशें



सुरंगे खुद चुकी है !
गाँव से गाँव के बिच,  
शहर से शहर के बिच,  
उडल दी है हवाओ ने सारी मिटटी !
हो चुकी है सबकी सिनख्त !
हर एक कब्र अब कब्र से जुड़ चुकी है,  
हर गाँव से हर शहर तक, 
हर शहर से हर मुल्क तक, 
हर मुल्क से हर जहाँ तक ! 

अब लाशें कब्र से बाहर आने को तैयार है 
अब लाशे सबकुछ फूंकने को बेताब है 
मशीनों से काटे दिए गए मजदूरों की लाशे,
फालतू जंग में शहीद हुए सिपहिओ की लाशें,
दिन दहाड़े जलाए गए 
और एक पर एक दफनाये गए दलितों की लाशें, 
बन के पत्तो की तरह झड चुके आदिवासिओ की लाशे ! 
जानी पहचानी और अनजानी भी, 
सब लाशे बाहर आने को तैयार है !

लाशें मिल चुकी है एकदूजे से, 
लाशें आ गई है नतीजे पे, 
अब धरती चीरकर लाशें फूटेगी 
फुट पड़ेगी बम बनकर लाशे नेताओ पर,
फुट पड़ेगी खू के हर विक्रेताओ पर, 
जिस की नीव में होगा लहू का दाग 
जिसकी भी बुनियाद होगा मुफ्त पसीना 
ऐसे हर शख्स पर, हर मकाँ पर टूट पड़ेगी लाशें !

लाशें अब बारूद बनकर बरसेगी, 
लाशें अब हिसाब को गर्जेगी, 
लाशें मागेगी अपने हिस्से की जमीं 
लाशें मागेगी आसमान अपने हिस्से का !
आखरी वक़त मुह में रखे गए पुराने सिक्के का मोल भी लाशें मागेगी !

लाशो से कोई बच न पायेगा, 
लाशो से कोई छिप न पायेगा, 
सुरंगे खुद चुकी है चारो तरफ से,   
बिना कोई वारंट, बिना कोई पर्ची 
लाशें अब कहीं से भी फुट पड़ेगी !

लाशे निकल चुकी है हर कब्रिस्ता से 
हर एक मुर्दाघर से चल पड़ी है लाशें,

हर आँगन पर गुहार लगाएगी,
हर दरवाजा खटखटाएगी,
राजमहल को आग लगाएगी,
सारे सेठो के सिर मुंडवाएगी 
कदम कदम आगे बढ़ रही लाशें अब वापिस कब्र में नहीं जायेगी, 
गर जायेगी तो न जाने कितनो की लाशें लेकर जायेगी !

- मेहुल मकवाना, 22 जनवरी 2013, वेजलपुर 


Saturday, January 12, 2013

युद्ध होगा



युद्ध होगा 
आज नहीं तो कल, 
कल नहीं तो परसों,  
परसों नहीं तो नरसो,
युद्ध होगा !

जब दोनों और से जनता की बेंड बजेगी ! 
तब जाकर सरहद पर सेकड़ो टेंक सजेगी !
फिर रोटी कपडा मकान भूलकर,  
सब पर सवार देश का भूत होगा !
युद्ध होगा !

शांति वार्ताए जब जब आगे बढती दिखेगी ! 
खू से खौलती नसे जब ढीली पड़ती दिखेगी ! 
क्यूँ है हाल हमारा ऐसा ?
उसका कही न कोई सुबूत होगा !
युद्ध होगा !

वो जब सोचेंगे तब होगा !
वो जब चाहेंगे तब होगा !
आज नहीं तो कल 
कल नहीं तो परसों 
परसों नहीं तो नरसों !
तुम चाहो या ना चाहो 
युद्ध जरुर होगा !

फिर बहते खून की खुश्बुओ का लगेगा उत्सव ! 
फिर लाशें जवानो की बन जायेगी बेलेट पेपर !
न कानो-कान खबर होगी किसीको, 
ना ही किसीको कुछ शक होगा !
युद्ध जरुर होगा !

- मेहुल मकवाना, 12 जनवरी 2013, अहमदबाद 

Monday, December 31, 2012

કવિતાઓ


મોરમાંથી મરવા થતા પહેલા,
અમથા ઝાપટામાં ય ખરી પડેલા
આંબા જેવી હોય છે કેટલીક કવિતાઓ.
સ્વાદથી ભરપુર પણ મોસમની મોહતાજ.
કેરી ભાવે છે પણ આંબા જેવી મધમીઠી કવિતાઓ મને નથી ગમતી.
ડ્રોઈંગરૂમની બરાબર સામે,
એક્વેરિયમની નજીક, બારી પાસે
મહેમાનની નજર ચડે એમ મુકાયેલા
મની પ્લાન્ટ જેવી હોય છે કેટલીક કવિતાઓ.
લીલોતરી કર્યાના સંતોષમાં રાચતી
સભ્યતાની સાબિતી જેવી મની પ્લાન્ટ બ્રાંડ કવિતાઓ મને નથી ગમતી.

બીટગાર્ડની ગોળીથી માંડ બચેલો કોઈ ભીલ
સમી સાંજે  ઊંડા જંગલમાં ઉતરી ગ્યો હોય,
અમથું ખીસ્કોલું નીકળે તોય અવાજ કરતા બારમાસી પાનખરિયા વનને
લીલુછમ કરવાનું સપનું જોતો સુતો હોય
અને સવારે એના કપાળની આરપાર ઉગી નીકળે ઘાસ
એવા વાંસ જેવી કવિતાઓ લખવી છે મારે.
કાં પછી,
બાઈ બચરા બધુયે મેલી રોટી માટે 
શહેરની સડકે શેકાતા જણને આવતી ઘરની યાદ જેવી કવિતાઓ લખવી છે મારે.  
ગટરના ઢાકણ જેવી ગોળ પૃથ્વી પર 
પરગ્રહવાસીની જેમ જીવજીવાતા જીવન જેવી કવિતાઓ લખવી છે મારે જો લખાય તો !
બાકી મેંગો જેવી મીઠી કે મની પ્લાન્ટ જેવી વૈભવી કવિતાઓ મને નહિ ફાવે.

મેહુલ મકવાણા, 30 નવેમ્બર 2012

Tuesday, November 20, 2012

अबके जब तिरंगेवाला दिन आएगा.....


अबके जब तिरंगेवाला दिन आएगा..... 

बेवकूफ थे हम जो ढूंढते रहे जीवन के असली रंग तिरंगे में !
पेड़ के पत्तो सा हरा हरियाली का 
उगते सूरज सा केसरी हमारी पुरखो के शोर्य का 
नियत सा शुभ्र श्वेत अमन का !
हम बेवकुफो को क्या पता की सारे रंग एक दिन 
बम्बई के समंदर की तरह काले मटमैले हो जायेंगे !
हम तो समजते रहे तिरंगे को शान 
देश के होने या न होने से जिनकी लेनदेन नही एसे 
हजारो गाँवो का भी सन्मान !
पन्द्रह अगस्त और छबीस जनवरी को स्कुल में बाँटी गई टॉफी सा मीठा 
समजते रहे हम तिरंगे को !
हम बेवकुफो को क्या पता की एक दिन यह इतना कडवा भी लगेगा 
की न झेल पाएंगे न थूक पायेंगे !
हम तो समजते थे तिरंगे को सुकून की चादर 
जिसे ओढने जवान हँसते हँसते शहीद होते है !
हम बेवकुफो को क्या पता की यह चादर 
इक दिन ऐसा खिलौना बन जायंगी 
जिस पर हम न हस पाएंगे न रो पाएंगे !
आज के बाद जब तिरंगे का दिन आएगा 
उसकी लहरों में यक़ीनन मंडराते गिद्ध दिखाई देंगे, 
सारे रंग बेरंग दिखाई देंगे , 
ब्युगल की आवाज बन जाएगी चीख,  
राष्ट्रगीत बन जायेगा सन्नाटा, 
सारे माने बदल जायेंगे !
हो सकता है किसी काले झंडे को ही कहना पड़े तिरंगा !
अबके जब तिरंगेवाला दिन आएगा.... 
.... हाथ सलामी को बड़ी मुश्किल से उठ पायेगा !

- मेहुल मकवाना, 20 नवंबर 2012  

(बाल ठाकरे को दिए गए तिरंगे के राष्ट्रिय सन्मान पर)





Monday, October 1, 2012

भूखा सूरज


देर रात की गहरी नींद में,
बस्ती के घने अँधेरे से बचकर 
बिना मेरी इजाजत के 
रेंगते कुत्तो को पीछे छोड़ता हुआ सूरज घुस जाता है मेरे पेट में
किसी लड़की के अनचाहे गर्भ की तरह !
फिर मटकों की आवाजे, पानी की ज़िक ज़िक..
बच्चो के जग जाने से पहले बीवी से बतियाने तीसरी शिफ्ट से जल्दी घर आया पढ़ोसी...
जिन्हें कभी गौर से देखा नहीं एसे परिंदों की आवाजे... जगाने लगती है मुझे !
गर्भ सा पेट में पड़ा सूरज अब शुरू करता है फैलना..
आँख मुंदने के लिए जिस हाथ को तकिया बनाया था वो आँख खुलते ही पेट पर पाता हु ! 
एक धक्का सा लगता है..सारे अंग सिकुड़ जाते दीखते है नाभि में..
दिन शुरू हुआ है 
सारी बस्ती में भागदौड़ एसे होती है जैसे उजियारे से डरते हो !
सूरज की गर्मी अब जोर पकड़ रही ..फ़ैल रहा है भूख का गर्भ !
दिन चढ़ते गुब्बारे सा फुलता जाता है सबका पेट ! 
चाय में बिस्कुट की तरह अब हंसी में नफरत..गुस्सा घुल रहा है !
हर कोई उखाड़ फेंकना चाहता है अपना अपना अनचाहा गर्भ 
पर कैसे ?
नाभि में से फूटनेवाले हर सपने को केद कर रखा है उस भूखे सूरज ने भीतर से ! 
कैसे करे आज़ाद उन सपनो को ?
एक दिन बात हो तो ठीक अब रोज रोज उस सूरज को हम क्या खिलाये ?
अबके जब मेरी रात की शिफ्ट होगी 
सारी थकावट भूलकर मै जगता रहूँगा !
पलभर भी नहीं सोऊंगा !
और अँधेरे में दबे पाँव आते सूरज को पेट में घुसने से पहले ही धर लूँगा रंगे हाथ !
कर दूंगा सारे सपने आज़ाद !

- मेहुल मकवाना, १ अक्तूबर २०१२, अहमदाबाद 

Tuesday, August 28, 2012

ભાષાઓ લઇ



દુધિયા દાંત પહેલાની ખરી પડેલી ઈચ્છાઓ લઇ,
બાળક આખરે ઢબી ગયું આંખોમાં પરીના કિસ્સાઓ લઇ.

આભે સહેજ કર્યો જાહેર છાંયનો અભરખો ત્યાં તો, 
પારેવાએ દોટ મેલી ચાંચમાં બધી ઘટાઓ લઇ.

નહિ હાકોટા, નહિ હોંકારા, નહિ નેણમાં નેહફુવારા,
અહી તો જે મળે છે, મળે છે ફિક્કા ડાચાઓ લઇ.

વ્યક્તિમાંથી અભિવ્યક્તિ સઘળી બાદ થઇ ગઈ,
એ ગયા તો ગયા, મારી બધીયે ભાષાઓ લઇ.

મેહુલ મકવાણા, ૨૫ ઓગસ્ટ ૨૦૧૨, અમદાવાદ 

Wednesday, July 18, 2012

ફૂટપાથની વરસાદી કવિતા



લ્હાય લ્હાય ભીતરમાં લાગી તો હોય પણ ભીંજ્યાંનું સુખ કેમ લેવું ?
આ પેલ્લા વરસાદ પહેલાની ચિંતા કે ફૂટપાથે કોરા કેમ રેવું ?

કાગડો થઇ ગયેલી છત્રીઓ બધીયે ઝાડવે કરીને બેઠી માળો,
હું પેઢીઓની પેઢીઓ ગોત્યા કરું પણ ક્યાંય ઘરનો મળે નહિ તાળો,
લોક આખું ય બેઠું હોય એના ભરોસે ત્યાં એને ખમ્મા એ કેમ કરી કેવું ?
ફૂટપાથે કોરા કેમ રેવું ?

આ ટેસનની છાપરીથી ન ઝીંક ઝીલાય, બેડા ભરી ભરીને પડે છાંટા,
આમથી તેમ ટાંટિયા ઘસ્યા કરું તોય સાલા હુંફને ચડે નહિ આંટા,
ઝબકતી વીજળી ને ગડગડની ફડકે કોરું લૂગડું ય ક્યાંથી ચોરી લેવું ?
ફૂટપાથે કોરા કેમ રેવું ?

આમ આભમાં દરિયા ઉછળતા હોય ત્યાં આંખોમાં પાણી કોણ દેખે ?
હેલે ચડે લોક આખુયે એવું કે મોઢે ટાયરની છાલકો ફેંકે,
જાત સંકેરી ટૂંટિયું કર્યું, હવે આ ટૂંટિયાને ક્યાં ટુંપી દેવું ?
ફૂટપાથે કોરા કેમ રેવું ?

મેહુલ મકવાણા, ૧૭ જુલાઈ, નારોલ